Ravi Ranjan - Hindi teacher - Ranchi
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Ravi Ranjan

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Subjective knowledge and collective creativity : A model of Educational in India

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Methodology

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    A1

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    Advanced

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Price : ₹1000.00 - Place : Ranchi (834001) शिक्षक का कर्तव्य व्यक्ति, समाज व राष्ट्र का चरित्र निर्माण करना है।

१.मुझ जैसा अध्यापक अपने पाठ्य (Text) में विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण पर बल देता है। अगर हमारे द्वारा दी गई शिक्षा में चरित्र निर्माण पर बल नहीं है तो उस शिक्षण महत्व शून्य के बराबर है। मैं अपनी कक्षा में इस बात पर भी बल देता हूँ कि सहज ज्ञान ही व्यक्तित्व निर्माण की वह सीढ़ी है जिसके माध्यम से हम दुनिया में अपनी पहचान कायम कर सकते हैं।

२.शिक्षा क्यों और कैसे दी जाये ?
दिमाग़ में तो यह घदमपटकी चलती रहती है कि स्कूल/कॉलेज क्यों जाना है ? क्या करने जाना है ?
दिमाग का उत्तर आ रहा है भाई मेरे स्कूल/कॉलेज जाना है बच्चों को पढ़ाने के लिए।
उसी वक्त दिल से निकला दूसरा सवाल आ रहा है कि क्या पढ़ाने के लिए और क्यों पढ़ाने के लिए ?
फिर बेचारा दिमाग उत्तर दे रहा है कि पाठ्यक्रम पढ़ाना है,बच्चों को कुछ सिखाना है वग़ैरह-वग़ैरह।
लेकिन दिल है कि उस उत्तर को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। दिल कह रहा है कि भाई ये पाठ्यक्रम पढ़ा के क्या हम शिक्षा शब्द के साथ न्याय कर रहे हैं ? मुझे तो नहीं लगता कि हमारी वर्तमान की पढ़ाई का सम्बन्ध किसी भी प्रकार से शिक्षा से है। वह मनुष्य को मशीन और केवल मशीन बनने पर बाध्य कर रही है।

३.आजकल सरकार, शिक्षक, समाज सभी हमारी शैक्षणिक गुणवत्ता को लेकर खासे चिंतित नज़र आ रहे हैं और इस गुणवत्ता को सुधारने के लिए तरह तरह के जतन किये जा रहे हैं और तरह तरह के कार्यक्रम शुरू किये जा रहे हैं। इन सब प्रयासों पर मेरा नज़रिया आप सब के सामने रखने की जुर्रत कर रहा हूँ। काफी लोग मुझसे असहमत हों सकते हैं लेकिन क्या करें सबका अपना अपना सोचने और विश्लेषण का तरीका है। तो बात कुछ यूँ है कि पता नहीं आखिर क्यों हम तथ्यों से खिलवाड़ करते जा रहे हैं। लगातार एक थोपी हुई शिक्षा और पाठ्यक्रम को अपनी मानसिकता से निकाल पाने में अक्षम हो रहे हैं।

४.शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि अाठवीं कक्षा तक किसी भी बच्‍चे को फेल नहीं किया जाएगा। दूसरे शब्‍दों में उसे किसी कक्षा में रोका नहीं जाएगा। पिछले दिनों दिल्‍ली के शिक्षा मंत्री ने केन्‍द्रीय शिक्षा मंत्री से यह माँग की है कि इस प्रावधान काे रद्द किया जाए। उनका मानना है कि फेल नहीं होने का डर नहीं होने के कारण बच्‍चे पढ़ते नहीं हैं।

५.आँखों में अश्रुधार, गले रुंधे-रुंधे, मुरझाये चेहरे और मंथर चाल वाले बच्चे बार-बार आँखों के सामने आ जा रहे हैं। कुछ रातों से नींद भी ढंग से नहीं आ रही है। मन में एक काँटा सा गढ़ गया है। खुद से ही प्रश्न कर रहा हूँ। कोई उत्तर नहीं मिल पा रहा है। उलझते ही जा रहा हूँ। कभी बच्चा बन कर सोच रहा हूँ तो कभी अभिभावक। समझ नहीं पा रहा हूँ आखिर यह फेल-पास क्यों? यदि हर नौकरी में लेने से पहले परीक्षा या इंटरव्यू होना ही होना है तो फिर बच्चे को यह तनाव क्यों दिया जाए ?

६.'परीक्षा के दौरान विद्यार्थियों द्वारा अनुचित तरीकों का सहारा लिया जाना किस बात का सूचक है? ' एक शिक्षक या अभिभावक के नाते आप क्‍या सोचते हैं।

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प्रसिद्ध चिंतक जे. कृष्णमूर्ति के शब्दों में, “शिक्षा का सबसे बड़ा कार्य एक ऐसे समग्र व्यक्ति का विकास है जो जीवन की समग्रता को पहचान सके। आदर्शवादी और विशेषज्ञ दोनों ही समग्र से नहीं खण्ड से जुड़े हुए होते हैं। जब तक हम किसी एक ही प्रकार की कार्यप्रणाली का आग्रह नहीं छोड़ते तब तक समग्रता का बोध सम्भव नहीं है।”

कृष्णमूर्ति शिक्षा का प्रथम कार्य यह मानते हैं कि वह प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मानसिक प्रक्रिया को समझने में मदद करे। कैसे उसके विचारों, प्रवृत्तियों और आचरण पर पारिवारिक या सामाजिक-साम्प्रदायिका पूर्वाग्रहों का प्रभाव पड़ता है। और ये बातें उसकी संवेदना, विचार और आचरण को किस प्रकार प्रभावित करती हैं। अर्थात अपने मन की बनावट और उसकी प्रक्रिया की सम्यक जानकारी उसे होनी चाहिए और यह तभी सम्भव है जब शिक्षा हमें मन को देखना सिखाए।

सही रिश्तों की बुनियाद है शिक्षा

पर आज दूर-दूर तक शिक्षा का यह उद्देश्य नहीं दिखता। बल्कि भरसक वह हमें अपने से इतना बाहर ले जाती है कि अपने में झाँकने की प्रवृत्ति ही नहीं बचती। सामाजिक वातावरण भी इसमें शिक्षा की मदद ही करता है। बल्कि शायद इसी के कारण शिक्षा ने भी आत्मान्वेषण को अपने कार्यक्षेत्र से निकाल बाहर किया है।

कृष्णमूर्ति के शब्दों में, “शिक्षा का उद्देश्य है सही रिश्तों की स्थापना, केवल दो व्यक्तियों के बीच ही नहीं बल्कि व्यक्ति और समाज के बीच में भी, और इसीलिए आवश्यक है कि शिक्षा सबसे पहले अपनी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को समझने में व्यक्ति की सहायक हो।”

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Practical information

  • Price of the workshop : ₹1000.00
  • Place : Ranchi (834001)
  • Maximum number of students during the training course : 30
  • Audience concerned : all
  • Course materials are provided to each participant
  • A training course certificate is awarded to each student
  • Validity of the workshop : all year around

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